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    अनूपसिंह तड़ागी

    अनूपसिंह तड़ागी (अनुमानित जीवनावधिः 1715-1794): कुमाऊँ का यशस्वी वीर जिसने अपने अपूर्व शौर्य, पराक्रम व नेतृत्व क्षमता से मातृभूमि की रक्षा की और युद्ध में रूहेलों के दांत खट्टे किए।


    कुमाऊ के तत्कालीन राजा कल्याण चन्द ने अपनी क्रूरता के कारण अपने राज्य में अपने अनेक शत्रु बना लिए थे। उससे असन्तुष्ट और भयभीत हिम्मत सिंह भागकर अली मोहम्मद खाँ रूहेला की शरण में रहने लगा था। कल्याण सिंह ने उसकी वहीं हत्या करवा डाली। शरणागत की हत्या का बहाना बनाकर रूहेलों ने 1744 में कुमाऊँ पर आक्रमण कर डाला। कुमाउँनी सेना अत्यल्प संख्या व न्यूनतम साधनों के कारण तराई (कुमाऊँ का दक्षिणी भाग) में रूहेलों की विशाल, साधन सम्पन्न, पेशेवर और प्रशिक्षित सैनिकों से टक्कर न ले सकी और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र की ओर भाग खड़ी हुई। डर के मारे राजा कल्याणचन्द गैरसैण (गढ़वाल की ओर) भाग गया। राज्य की अस्मिता लुटती देख अनूप सिंह तड़ागी का क्षत्रित्व जाग उठा। तड़ागी ने सभी कुमाउँनी राजपूतों को एकत्रित किया। उन्हें राज्य की रक्षा के लिए रूहेलों से युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। और अन्ततः उनसे टक्कर ली। इतिहास बताता है, हेलों का राजधानी अल्मोड़ा पर कब्जा हो गया था, किन्तु इस वीर पुरुष ने अपनी नेतृत्व क्षमता से रूहेलों से जो टक्कर ली वह बेमिसाल थी। रूहेले अल्मोड़ा से आगे नहीं बढ़ सके थे। कहा जाता है। कि गढ़वाल के राजा की मध्यस्थता से रुहेले कुमाऊँ से वापस चले गए और कल्याण चन्द को अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त हो गया।


    राजा कल्याण चन्द के ताम्र पत्र शाके 1667 (1745) के अनुसार रुहेलों का निष्कासन करने में अपूर्व सहायता करने वाले यशस्वी योद्धा अनूपसिंह तड़ागी को रौत (जागीर) प्रदान करने का उल्लेख है। ताम्रपत्र में कहा गया है कि “जिस दिन रूहेला पर्वत आया उस दिन अनूप सिंह ने बड़ा राजधाऊ किया, अर्थात राजा के साथ युद्ध में बड़ी सहायता की। सभी 12 गर्खा (प्रान्तों) के गर्खाध्यक्षों को स्वयं पत्र लिखकर रूहेलों का सामना करने के लिए अल्मोड़ा बुलाया। सर्वत्र जोलिया (दूत) भेजकर, अपने घर से रुपए लगाकर, कुम्मैयों को एकत्र कर हमारे गढ़ लाया, रूहेलों के विरुद्ध सर्वत्र लोगों को सावधान कर उनको रूहेलों के साथ नहीं मिलने दिया।


    राजा कल्याण चन्द के एक और ताम्रपत्र सन 1737 में उल्लेख मिलता हैं कि जब कुमाऊँ के कुछ लोग गैड़ा के साथ होकर पीपली (रोहेलखण्ड) के राजा नरपत सिंह के पुत्र को कुमाऊँ की गद्दी सपने का षड़यंत्र रच रहे थे तो अनूप सिंह पीपली से भाग आया। उसने गैड़ा का साथ छोड़ दिया और राज्य के तमाम प्रमुख लोगों को अपने पक्ष में करके डोटी (नेपाल) गया। वहाँ से राजा कल्याण चन्द को लाकर कुमाऊँ की गद्दी पर बिठाया। राज्य भर के थानों व गढ़ियों में अपने लोगों को बिठलाकर पक्की सुरक्षा व्यवस्था की। गैड़ा को मरवा डाला। माल (तराई) का पक्का बन्दोबस्त किया। राजा कल्याण चन्द उसका एहसान जीवनभर नहीं भुला सका था। राजा ने उसको तथा उसके वंशधरों को तिरबौन। (बारामण्डल) तथा माल में कर मुक्त जागीर दी। अनूप सिंह के साथ जैमान सिंह तड़ागी का भी उल्लेख है ताम्रपत्र में।


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