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    बुद्धि बल्लभ पंत

    buddhiballabhpant

    अल्मोड़ा नगर के अतीत की कल्पना कीजिये। इस पर्वतीय प्रदेश में अंग्रेजों के शासन की स्थापना को केवल पच्चीस वर्ष हुए थे। 1840 में जब नगर की जनसंख्या 4000 के लगभग रही होगी। कोई मोटर मार्ग नहीं थे। पैदल अथवा खच्चरों पर आवागमन तथा माल ढलाई होती थी। बिजली पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी। विद्यालय नहीं थे। कुछ पंडित लोग अपने-अपने घरों में विद्यार्थियों को पढ़ाते थे। पाठ्यक्रम में संस्कृत, हिन्दी तथा अंकगणित की शिक्षा दी जाती थी। सम्पन्न परिवारों के मेधावी बालक अग्रिम शिक्षा के लिये वाराणसी भेजे जाते थे। वे भी मात्र संस्कृत, हिन्दी, ज्योतिष तथा वैद्यक का ज्ञान प्राप्त कर लौटते थे। समाज में कट्टरपन था। बाहरी जगत का ज्ञान नहीं के बराबर था।


    ऐसे वातावरण में नगर के मोहल्ला त्यूनरा के एक प्रतिष्ठित वैद्य जयदेव पंत के घर एक बालक ने जन्म लिया। उसको बुद्धि बल्लभ पंत नाम दिया गया। श्री जयदेव पंत मूल रूप से ग्राम जजूट (गंगोलीहाट) के निवासी थे, जिनके पूर्वज अल्मोड़ा में बस गये थे। प्रारम्भिक शिक्षा तत्कालीन परम्परानुसार ही हुई। बुद्धि बल्लभ के जन्म के कुछ समय उपरान्त अंग्रेज सरकार के संरक्षण में ईसाई मिशनरियों ने आधुनिक शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु अल्मोड़ा नगर में मिशन स्कूल की स्थापना की जो आज रैमजे इण्टर कॉलेज के नाम से प्रसिद्ध है। यह मिशन स्कूल उत्तराखण्ड का आधुनिक शिक्षा पद्धति पर आधारित प्रथम स्कूल था। इस विद्यालय में उस समय हिन्दी, संस्कृत के साथ अन्य विषयों तथा वाह्य जगत का ज्ञान भी दिया जाता था।


    प्रारम्भिक शिक्षा समाप्त करने के बाद मेधावी छात्र बुद्धि बल्लभ ने इस नये मिशन स्कूल में पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। उस समय के कट्टरपंथी समाज में ईसाई स्कूल में शिक्षा पाना हेय दृष्टि से देखा जाता था। पिता एक प्रतिष्ठित चिकित्सक थे। उनके तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों से अच्छे सम्बन्ध थे। उनके अंग्रेज मित्रों ने भी परामर्श दिया कि बुद्धि बल्लभ को आधुनिक शिक्षा प्रदान की जाय क्योंकि भविष्य आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा में ही है। बुद्धि बल्लभ क के तीव्र आग्रह के आगे पिता को झुकना पड़ा। उनको मिशन स्कूल में प्रवेश दिलाया गया। वह मिशन स्कूल के प्रारम्भिक विद्यार्थियों में थे। छ: वर्ष अध्ययन के उपरान्त तत्कालीन उच्चतम कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह उसी विद्यालय में शिक्षक नियुक्त किये गये। उन्हें अध्यापकों की परीक्षा में प्रथम आने पर स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। विद्यार्थी काल में ही पंत तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को हिन्दी सिखलाया करते थे। इससे उनके अनेक अंग्रेज अधिकारियों से, जो बाद में भारतीय प्रशासन में ऊँचे पदों पर रहे, जीवन पर्यन्त मधुर सम्बन्ध रहे। पत्र व्यवहार होता रहा। इनसे घनिष्ठता के कारण पत का अंग्रेजी भाषा का ज्ञान बढ़ता रहा तथा वाह्य जगत का बहुत उपयोगी ज्ञान प्राप्त हुआ। अध्यापन कार्य के अतिरिक्त वह तत्कालीन राजकीय बुक क्लब में पुस्तकालयाध्यक्ष भी थे। विभिन्न विषयों की पुस्तकों के अध्ययन से उनके ज्ञान तथा अनुभव में वृद्धि होती गयी।


    तत्कालीन कुमाऊँ कमिश्नर मेजर जनरल हैनरी रैमजे, जो कमिश्नर बनने से पूर्व कैप्टन के पद पर अल्मोड़ा में लम्बे समय तक रहे थे, जयदेव पंत तथा बुद्धि बल्लभ पंत से भली-भाँति परिचित थे। सर रैमजे ने बुद्धि बल्लभ को 1863 में राजस्व विभाग में नियुक्ति दी। अतः उन्होंने अध्यापक एवं पुस्तकालयाध्यक्ष पदों से त्याग पत्र दे दिया। कुछ समय पश्चात् उनकी पदोन्नति रजिस्ट्रार कुमाऊँ के कार्यालय में हुई। उस समय रैमजे ही रजिस्ट्रार कुमाऊँ भी थे। भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने कुमाऊँ कार्यालय के निरीक्षण के पश्चात् बुद्धि बल्लभ के कार्य की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि पूरे प्रांतभर में पंत का कार्य सर्वश्रेठ है। इसी कार्यकाल में उनको अनेक उपविधियों (Bye Laws) का अंग्रेजी से हिन्दी में रूपान्तरण का कार्य दिया गया। उनके उत्कृष्ट कार्य की प्रशंसा करते हुए उन्हें अनेक पुरस्कार प्रदान किये गये। एक निबन्ध प्रतियोगिता में, जिसमें अंग्रेज कर्मचारियों ने भी भाग लिया था, प्रथम आने पर रैमजे ने उन्हें पचास रुपये का पुरस्कार दिया था। 1869 में वह मुंसरिम पद पर पदोन्नत किये गये थे।


    बुद्धि बल्लभ पंत एक चिन्तक भी थे। आधुनिक सभ्यता की दौड़ में कुमाऊँ पिछड़ न जाये इसके समाधान के लिए उन्होंने तत्कालीन प्रबुद्धजनों को एकत्र कर 1870 में अल्मोड़ा में 'डिबेटिंग क्लब' नामक संस्था की स्थापना की। इसकी बैठकों में कुमाऊँ की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक समस्याओं एवं उनके समाधान खोजने पर विचार विमर्श किया जाता था। समस्याओं तथा सुझावों से सरकार को अवगत कराया जाता था। बुद्धि बल्लभ पंत प्रथम व्यक्ति थे। जिन्होंने कुमाऊं में (तत्कालीन कुमाऊँ में टिहरी रियासत को छोड़कर गढ़वाल का शेष भाग भी सम्मिलित था) जाग्रति लाने का कार्य किया। उन्होंने कुमाऊँ को आधुनिकता से जोड़ने का प्रयास किया था। वह इस क्षेत्र में राष्ट्रीयता की चेतना जगाने वालों के अग्रदूत थे। बाद में 1903 में हैप्पी क्लब, 1909 में सोशियल क्लब तथा 1916 में कुमाऊँ परिषद् नामक जिन संस्थाओं का गठन हुआ था उन संस्थाओं तथा उनसे जुड़े तत्कालीन युवाओं जिनमें मुख्य थे हर गोविन्द पंत, गोविन्द बल्लभ पंत, बद्री दत्त पाण्डे, मोहन सिंह मेहता, हेम चन्द्र जोशी, विक्टर मोहन जोशी, लक्ष्मी दत्त शास्त्री आदि के प्रेरणा स्रोत डिबेटिंग क्लब तथा बुद्धि बल्लभ पंत ही थे।


    पण्डित पन्त की यहां की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियों पर गहरी पकड़ थी। इन पर विचार विमर्श के लिए उन्होंने 1871 में तत्कालीन बुद्धिजीवियों और प्रभावशाली व्यक्तियों को एकत्रित कर 'डिबेटिंग क्लब' की स्थापना की। तत्कालीन ले. गवर्नर सर विलियम म्यूर को क्लब में आमंत्रित किया। ले. गवर्नर क्लब के कार्य कलापों को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। सर विलियम म्यूर ने पन्त जी को एक हिन्दी समाचार पत्र निकालने की सलाह दी, ताकि क्षेत्रीय समस्याओं और उन पर बुद्धिजीवियों के विचारों से अन्य लोग अवगत हो सकें। अतः उसी वर्ष पन्त जी ने 'अल्मोड़ा अखबार' का प्रकाशन प्रारम्भ कर दिया।लार्ड रिपन (1880-84) के समय जब सबके लिए न्यायिक बराबरी हेतु एलबर्ट बिल लाया गया तो अल्मोड़ा में इसका समर्थन हुआ। श्री बुद्धि बल्लभ पन्त तथा श्री लीलानन्द जोशी के सहयोग से इसके समर्थन में सभा हुई।


    कुमाऊँ में 1857 में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। एक सैनिक अधिकारी शिक्षा विभाग का अधिकारी होता था। फलतः शिक्षा विभाग लम्बे समय तक उपेक्षित ही रहा। 1871 में बुद्धि बल्लभ पंत की प्रतिभा और उनकी विशिष्ट सेवाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें कुमाऊँ मण्डल का विद्यालय निरीक्षक नियुक्त किया गया। वह प्रथम भारतीय थे जिनकी नियुक्ति विद्यालय निरीक्षक पद पर की गई थी। उन्होंने कार्यभार ग्रहण करने के उपरान्त कुमाऊँ में शिक्षा विभाग का विधिवत् गठन किया। शिक्षा का पाठ्यक्रम निर्धारित किया। शिक्षकों का चयन कर नियुक्तियाँ दीं। शिक्षकों के प्रशिक्षण का प्रबन्ध किया। वह स्वयं भी शिक्षकों को प्रशिक्षण देते थे। उन्होंने योग्य व्यक्तियों से कुमाऊँ गढ़वाल के इतिहास-भूगोल पर पुस्तकें लिखवाई थी तथा स्वयं भी लिखी थी। उन्होंने विद्यालयों के निरीक्षण हेतु पूरे मण्डल का अनेक बार भ्रमण किया था। जिस समय उन्होंने कार्यभार ग्रहण किया था उस समय कुमाऊँ में दो देहाती मिडिल स्कूल तथा 116 प्राथमिक स्कूल थे। उनके पद त्याग के समय यह संख्या बढ़ कर एक कॉलेज, तीन हाईस्कूल, सत्रह मिडिल स्कूल तथा दो सौ चार प्राथमिक स्कूल हो चुकी थी। बदरी दत्त पाण्डे के अनुसार, "कुमाऊँ में शिक्षा की जड़ जमाने वाले पंडित बुद्धि बल्लभ पंत जी थे।"


    1876 में महाराज ग्वालियर की बदरीनाथ यात्रा के समय बुद्धि बल्लभ पंत अंग्रेज सरकार की ओर से उनकी यात्रा के प्रबन्ध के लिय पोलीटिकल ऐजेण्ट नियुक्त किये गये थे। उनके प्रबन्ध से प्रसन्न होकर महाराज सिंधिया ने उन्हें ग्वालियर राज्य में उच्च पद देने का प्रस्ताव किया। पंत जी राजकीय सेवा से अवकाश लेकर कुछ समय ग्वालियर रहे परन्तु जलवायु प्रतिकूल होने के कारण अपने पूर्व पद पर अल्मोड़ा वापस लौट आये।


    लॉर्ड लिटन 1876 से 1880 तक भारत का वॉयसराय रहा। उसने भारतीयों का अनेक प्रकार से दमन किया। उसने भारत में देशी भाषाओं में छपने वाले समाचार पत्रों पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिये। उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली। अखबारों में सरकार की आलोचना प्रतिबन्धित कर दी गयी। वही छप सकता था जो सरकार चाहती थी। स्वाभाविक है कि इसका प्रभाव अल्मोड़ा अखबार पर भी पड़ा। पंत जो अखबार संस्थापक और मार्गदर्शक थे इससे व्यथित हुए। डिवेटिंग क्लब में भी इस पर चर्चा होती रही। लॉर्ड लिटन की नीतियों ने भारतीयों के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाई।


    1880 में लॉर्ड रिपन वॉयसराय नियुक्त हुआ। वह एक उदार व्यक्ति था। उसने लॉर्ड लिटन की अनेक कुनीतियों को समाप्त किया। अखबारों से भी प्रतिबन्ध समाप्त कर दिया गया। लॉर्ड रिपन भारतीयों को सम्मान तथा अधिकार देने का पक्षधर था। उसने अपनी काँसिल के कानून सदस्य इलबर्ट से एक नया कानून बनाने को कहा। यह इलबर्ट बिल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस कानून का उद्देश्य यह था कि भारतीय जजों को भी अंग्रेज अपराधियों के मुकदमे सुनने का अधिकार दिया जाय। केवल भारत में रहने वाले अंग्रेजों ने ही नहीं वरन् इंग्लैण्ड वासियों ने तक इस विधेयक का विरोध किया। यह विधेयक पास न हो सका। लॉर्ड रिपन ने त्याग पत्र दे दिया।


    जहाँ अंग्रेजों ने इलबर्ट बिल का विरोध किया वहीं भारतीयों ने इसका पुरजोर समर्थन किया। भारत में स्थान-स्थान पर इलबर्ट बिल के समर्थन में सभायें आयोजित की गईं। डिबेटिंग क्लब ने भी इसका समर्थन किया। 1883 में अल्मोड़ा में नन्दा देवी के मैदान में आयोजित सभा में इलबर्ट बिल का समर्थन किया गया। बुद्धि बल्लभ पंत ने इस सभा की अध्यक्षता की तथा इसके पक्ष में भाषण दिया। पंत का, जो उस समय एक सरकारी कर्मचारी थे, ऐसी सभा की अध्यक्षता करना तथा भाषण देना तत्कालीन परिस्थितियों में अत्यन्त साहस का कार्य था। यह उनके देश प्रेम और स्वाभिमान को प्रदर्शित करता है। यह सभा अंग्रेज शासन के प्रति विरोध प्रदर्शन की पहली प्रतीक थी। इसके कुछ समय उपरान्त बुद्धि बल्लभ पंत ने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया।


    उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में कुमाऊँ में माध्यमिक शिक्षा का एक मात्र विद्यालय अल्मोड़ा का रैमजे कॉलेज था। यह मिशनरियों द्वारा संचालित था। सरकार भी सहायता देती थी। यद्यपि विद्यालय में प्रवेश में कोई प्रतिबन्ध नहीं था परन्तु प्रत्येक विद्यार्थी के लिए चाहे वह किसी धर्म का हो बाइबिल का अध्ययन अनिवार्य था। 1888 में नगर के एक विद्यार्थी को ईसाई बनाने का प्रयास किया गया। इससे नगर तथा क्षेत्रवासियों की भावनायें जाग्रत हुई। बुद्धि बल्लभ पंत ने हिन्दू हाईस्कूल खोलने की योजना बनाई। क्षेत्रवासियों के समर्थन और सहयोग से पंत जी 1889 में हिन्दू हाईस्कूल स्थापित करने में सफल हुए। उन्होंने स्वयं 3400 रुपये विद्यालय की स्थापना के लिए दिये। यह उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी धनराशि थी। तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर ने उस विद्यालय का उद्घाटन किया। अभिनन्दन व भेंट करते हुए पंडित ज्वाला दत्त जोशी ने कहा था कि आज पंडित बुद्धि बल्लभ पंत अपनी योजना को साकार रूप में देखने के लिए हमारे बीच उपस्थित नहीं है, इसका हमें दु:ख है। यही हिन्दू हाईस्कूल बाद में राजकीय हाईस्कूल और 1921 से राजकीय इण्टर कॉलेज, अल्मोड़ा के नाम से विख्यात हुआ।


    बुद्धि बल्लभ पंत सामाजिक तथा रचनात्मक कार्यों में सदा अग्रणी रहे। डिबेटिंग क्लब तथा अल्मोड़ा अखबार के माध्यम से उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र में एक नई चेतना लाने का प्रयास किया। मिशन स्कूल जो आज रैमजे इण्टर कॉलेज है, के उत्थान में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। 1870 में उन्होंने डिबेटिंग क्लब की ओर से संस्कृत पाठशाला भी खोली थी। उत्तराखण्ड में आधुनिक शिक्षा की नींव डालने का श्रेय पंत जी को ही है। नैनीताल में रैमजे अस्पताल सम्प्रति गोविन्द बल्लभ पंत अस्पताल, क्रॉस्थवेट हॉस्पिटल सम्प्रति बदरीदत्त पाण्डे अस्पताल की स्थापना में भी उनका योगदान रहा है। वह 1884 से कुछ समय तक अल्मोड़ा नगर पालिका के पदेन सेक्रेटरी भी रहे। तब कमिश्नर कुमाऊँ नगर पालिका का पदेन अध्यक्ष होता था।


    वह एक स्वतंत्र विचारों वाले स्वाभिमानी व्यक्ति थे। वह शासन का अंध समर्थन नहीं करते थे। ब्रिटिश सरकार उनके स्वतंत्र विचारों के कारण उनसे संशकित रहती थी। ब्रिटिश सरकार अपने समर्थकों को रायबहादुर, रायसाहब आदि सम्मान देती थी। पंत जी के राष्ट्रीय विचारों के कारण उन्हें रायसाहब या रायबहादुर की पदवी नहीं दी गई। उनकी विशिष्ट एवं उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें महारानी विक्टोरिया की ओर से प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया था।


    स्व. बुद्धिबल्लभ पंत के दो पुत्र थे। स्व. गौरीदत्त पंत जो गढ़वाल में डिप्टी कलेक्टर थे तथा स्व. रामदत्त पंत जो अल्मोड़ा में असिस्टेंट इन्सपेक्टर ऑफ स्कूल थे। दोनों का अल्पआयु में देहान्त हो गया था। रामदत्त पंत के पुत्र भोलादत्त पंत अल्मोड़ा में जोइन्ट मजिस्ट्रेट रहे थे। उनका भी सेवाकाल में ही निधन हो गया था। गौरीदत्त पंत के तीन पुत्र थे। ज्येष्ठ पुत्र लक्ष्मीदत्त पंत प्रधानाचार्य रहे थे तथा 1953 में अल्मोड़ा नगर की जनता ने सीधे चुनाव में उनको नगरपालिका का अध्यक्ष निर्वाचित किया था। मझले पुत्र अम्बादत्त पंत देवरिया, बस्ती आदि जिलों में जिलाधिकारी रहे। तथा अविभाजित उत्तर प्रदेश में केन कमीश्नर पद से सेवानिवृत्त हुए। कनिष्ठ पुत्र नारायण दत्त पत इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता थे। तथा उत्तर प्रदेश सरकार के स्थायी वकील थे। बाद में वह उत्तर प्रदेश सरकार के विधि परामर्शी भी रहे। लक्ष्मीदत्त पंत के पुत्र डॉ. मदन मोहन पंत अल्मोड़ा में पशु चिकित्सा अधिकारी रहे। उनका भी अल्पआयु में देहान्त हो गया था।


    आवश्यकता है कि उनके योगदान को ध्यान में रखते हुए उन्हें स्वतंत्रता सेनानी घोषित किया जाय तथा नगर के राजकीय इण्टर कॉलेज का नामकरण उनके नाम पर किया जाए।


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