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    जीतू बगड्वाल

    jeetubagdwal

    ‌जीतू बगड्वाल (अनुमानित जीवनकालः नौवीं सदी का उत्तरार्द्ध): उच्ची बगुड़ी (छाम से गंगा के उस पार), टिहरी गढ़वाल। जीतू के जीवनकाल और उससे जुड़ी अन्य घटनाओं के सम्बन्ध में कई दन्तकथाएं प्रचलित हैं। यह निर्विवाद सत्य है कि वह अपने समय का अकेला वीर पुरुष, सुन्दर, प्रकृति प्रेमी, गीतों का रसिया और बाँसुरी वादक था। यहां उसके जीवन वृतान्त पर कुछ इतिहास सम्मत प्रकाश डाला गया है। अधिक तथ्यात्मक जानकारी पाठक अन्यत्र से प्राप्त कर सकते हैं। जीतू बगड्वाल के पिता का नाम गरीबाराई और माता का नाम सुमेरु था। कुछ का कथन है। कि गरीबाराई के पिता कुंजराई धारा नगरी निवासी था। आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध में किसी समय वह गढ़वाल क्षेत्र में आकर बस गया। देवलगढ़ में उस समय राजा मानपाल का राज्य था। बगुड़ी गाँव का निवासी होने के कारण वह 'बगुड़ीवाल' और आगे चलकर 'बगड्वाल' कहा जाने लगा। जीतू का एक भाई सोबनू और बहिन सोबनी थी। बगुड़ी गांव का ऐतिहासिक सेरा जीतू बगड्वाल की जीवन गाथा से जुड़ा है। इसी सेरा में रोपाई करते मय बैलों की जोड़ी के साथ आछरियों (परियों) द्वारा जीतू का अपहरण हो गया था। बैलों की जोड़ी सहित वह जीवित ही धरती में समा गया था (पंवांड़े के अनुसार)। एक दन्त कथा के अनुसार यह घटना छह गते आषाढ़ मास में घटी थी।


    ‌एक दूसरी कथा के अनुसार जीतू की बुद्धि एवं चातुर्य से राजा मानशाह अति प्रसन्न था। राजा ने उसे अपना दरबारी नियुक्त कर दिया। बाद में उसे कर वसूलने का जिम्मा सौंप दिया। राजा से अन्तरंगता हो जाने के कारण वह बेरोकटोक राजमहल में आने-जाने लगा। आकर्षक कद काठी के कारण राजघराने की बहू-बेटियों से उसकी निकटता हो गई। यह बात राजा को नागवार गुजरी। क्रुद्ध होकर राजा ने नारायण चौधरी, भट्ट बिनायक के हाथों श्रीनगर के निकट शीतला की रेती मे जीतू का वध करवा दिया। अकाल मृत्यु के कारण उसकी मृत आत्मा राज दरबार में डरावने करतब दिखाने लगी। अन्ततः मृत आत्मा को प्रसन्न करने के लिए राजा के आदेश से गढ़वाल के प्रत्येक गांव में उसे नचाया जाने लगा। उसकी वीरता, सुन्दरता, बाँसुरी वादन और आछरियों द्वारा उसका हरण कर लिए जाने की घटना को पवांडों और जागरों में गाए जाने की प्रथा कमोबेश आज भी गढ़वाल में प्रचलित है।


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