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    कार्तिक स्वामी मंदिर

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    हमारे भारतीय पौराणिक काल से संबंधित कई मंदिर व स्थान उत्तराखंड की भूमि में प्रमुख रूप से स्थापित है। उत्तराखंड की भूमि आध्यात्म के क्षेत्र में भी प्रमुख स्थान रखता है। चार धामों के साथ साथ कई मंदिर ऐसे है जो अपना खास महत्व रखते है। उन्हीं में से एक है रुद्रप्रयाग जिले में स्थित कार्तिक स्वामी मंदिर। यह मंदिर भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का है।


    समुद्र तल से लगभग 3050 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर में जून के महीने में महा यज्ञ होता है। इसके साथ ही बैकुंठ चतुर्दशी पर्व पर मेला भी लगता है। यह मंदिर उत्तर भारत का एकमात्र कार्तिकेय भगवान का मंदिर है। यह मंदिर चमोली और रुद्रप्रयाग जिले के लगभग 365 गांवों के इष्ट देवता के रूप में पूजा जाता है।


    कार्तिक स्वामी मंदिर पहुँचने के लिए कनकचौरी तक सड़क मार्ग मौजूद है फिर लगभग 3 किमी0 का पैदल मार्ग है। कार्तिक स्वामी मंदिर से हिमालय की ख़ूबसूरत पर्वत श्रेणीयों का मनोरम दृश्य काफी मनमोहक और अद्भुद दिखता है।


    पौराणिक कथा


    कहा जाता है कि जब त्रिदेव और बाकी सभी देवताओं द्वारा यह तय किया जाने लगा कि प्रथम पूजनीय कौन देवता होगा तब यह निर्धारित किया गया कि जो भी सबसे पहले सम्पूर्ण विश्व की परिक्रमा करके आएगा वही प्रथम पूजनीय होगा। ऐसे में सभी देवताओं के साथ कार्तिकेय भी अपने वाहन मोर में बैठ के परिक्रमा करने को निकल गए। वहीं गणेश जी सबसे अलग होकर भगवान शिव और माँ पार्वती के चारों और परिक्रमा करने लगे। आश्चर्यचकित भगवान शिव और पार्वती ने जब उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो भगवान गणेश ने कहा कि आप माता पिता में ही मेरा सम्पूर्ण विश्व समाहित है। माँ पर्वती, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती सहित त्रिदेव भी श्री गणेश के इस बुद्धिमत्ता से काफी प्रभावित हुए। और उन्हें प्रथम पूजनीय घोषित कर दिया गया।।


    कार्तिकेय के लौटने पर जब उन्हें यह बात पता चली तो इस बात से क्रोधित होकर उन्होंने वही अपने मांस को त्यागकर फेंक दिया और सिर्फ हड्डियों का ढांचा लेकर क्रेंच पर्वत आ गए। तब से यहीं इनकी पूजा की जाती है।


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