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    गढ़वाली लोक साहित्य में जीवन मूल्य

    गढ़वाली लोक साहित्य लोक जन की अनुभूतिजन्य, सहज, सरल, स्वाभाविक अभिव्यक्ति है जिसमें जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति अनायास ही हुई है। चाहे वह लोक गीत हों, लोक कथा या लोक गाथा। प्रकृति का निकट सानिध्य गढ़वाली लोकजनों की अपनी विशिष्टता है। जहां जन्म से ही वह प्रकृति की निर्मल क्रोड़ का सहभागी बना है। अतः प्रकृति से उसका अत्मीय सम्बन्ध अपनी विशिष्टता में अनूठा है। उसके सभी क्रिया-कलापों में प्रकृति का साहचर्य दृष्टिगोचर होता है। इसलिए इन लोक जनों द्वारा जो लोक साहित्य प्रसूत हुआ है, उसमें प्रकृति की उपस्थिति स्वयमेव हो जाती है। प्रकृति के प्रति लोकजन का यह प्रेम एक शाश्वत मूल्य है जो कि गढ़वाली लोक साहित्य में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। लोक गीतों, लोक कथाओं, लोकगाथाओं, में प्रकृति आत्मीय सम्बन्धों की पीठिका बनी है। प्रकृति मानव जगत के क्रिया कलापों में निमग्न दिखाई देती है। वह जीवन का एक आवश्यक अंग भी है। गढ़वाली लोक जीवन पूर्णतया या आंशिक रूप से प्रकृति पर ही निर्भर है अतः उसके पारिवारिक ,सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक साहित्यिक पहलुओं में प्रकृति एक अनिवार्य तत्व के रूप में उपस्थित रहती है।


    वैदिक परम्परा के अनुरूप प्रकृति के विविध उपादान गढ़वाली लोक साहित्य में भी पूजित हुए हैं। एक लोक गीत में अग्नि का आहृवान आत्मीय सम्बोधन से हुआ है। अग्नि इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके बिना ब्रहृमा भी भूखे रह गए हैं-


    ऐ जा अगनी मेरा मातलोक मेरा मातलोक
    त्वै बिना अगनी ब्रहमा भूखों रैगे,


    गढ़वाली लोक साहित्य में प्रकृति जीवन के विविध पक्षों से संयुक्त हुई है तथा उसे देवरूप प्रदान किया गया है। उदाहरणार्थ - भूम्याल या क्षेत्रपाल खेती का देवता है। जिसे खेती का पहला अन्न और वृक्ष का पहला फल समर्पित करने के उपरान्त ही लोक जन उसका उपयोग स्वंय के लिए करते हैं। नागर्जा पशुधन का देवता तथा कुछ क्षेत्रों में बरसात का देवता है।


    इन विविध देवरूपों की स्तुति कर उनसे 'भायों' व समस्त गढ़वाल तथा लोक के कल्याण तथा समृद्धि की कामना की गयी है-


    जौ जश दे बस्ती माता
    जौ जश दे कूरूभ देवता
    जौ जश दे भूमि का भूम्याल देवता
    जौ जश दे पंचमान देव
    जौ जश दे भायों की जमात
    जौ जश दे भूम गढ़वाल


    जल प्रकृति का अभिन्न अंग है। गढ़वाली लोक साहित्य में जल की पूजा का विधान है। विवाह के पश्चात वर-वधू के द्वारा निकटस्थ जल स्रोत की पूजा की जाती है।


    नगेलों देवता के जागर गीत में देवता के आहृवान द्वारा पृथ्वी पर हरियाली, लैन्दी के दूध, लिए निपूती के लिए, पूत, कुँवारे के लिए ब्याह की कामना की गई है, जिसके माध्याम से प्रतीकात्मक रूप से समाज के हर वर्ग की सुख समृद्धि व कल्याण आदि जीवन मूल्य ही प्रतिष्ठत हुए हैं। इस गीत की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-


    नगेलो आयो, हरियाली जमोंद
    नगेलो आयो लेन्दी वैन्दा दूध
    नगेलो आयो क्वारा देद ब्यौऊ


    गढ़वाली ऋतुगीतों जैसे बसंती, झुमैलो, खुदेड़ तथा चैती में प्रकृति मनुष्य के सुख-दुःख की सहचरी, सहभागी बनी है।


    प्रकृति मनुष्य -जीवन के प्रत्येक क्षण, प्रत्येक घटना, प्रत्येक अनुभूति और उसके जीवन के हर क्षणांश के साथ जुड़ी हैं। शाश्वत मूल्यों में प्रकृति सर्वोपरि है। प्रकृति के निर्मल सानिध्य में अवस्थित गढ़वाल जैसी पावन भूमि में जो लोकगीत निःसृत हुए हैं, उनमें ऋतुओं का आहृवान, अभिनन्दन कुछ इस प्रकार से किया गया है कि जैसे प्रकृति के उस उपादान से कोई मानवीय रिश्ता है। बुरांश के फूल को ’भाई’ कहकर सम्बोधित किया गया है जो कि उतावला व जाति का श्रेष्ठ है-


    ’बुरांश दादू तु बड़ो उतालू रे
    औरु फूल तू फूलण नी बेंदी
    जाति को तू खास ठकरोल’


    गढ़वाली लोकगीत ’गो सरूप पृथ्वी’ धर्म सरूपी आकाश, उदयंकारी कांठा, भानुपंखी गरूड़, मेघलोक, इन्द्रलोक, सूर्यलोक, चद्रलोक, पवन व जन्तु-जीवन, कीड़े मकोड़े नर-नारैण के जागरण के आहृवान के साथ ही समस्त जड़ चेतन प्रकृति को भी सम्बोधित करते हैं। इन सबके जागरण के परिपार्श्व में प्रकारान्तर से जीव और जगत के मंगल व कल्याण की कामना की गयी है। यहां प्रकृति एक असीम सत्ता व सर्वोच्च मूल्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हुई है।


    लोक साहित्य में वृक्षों को काटने का निषेध है तथा यह भी मान्यता है कि पवित्र वृक्षों को काटने से उनसे दुध या खून की धारा प्रवाहित होने लगती हैं। कौए जैसा सामान्य पक्षी जिसे साधारणतया उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है, गढ़वाली लोकसाहित्य में शकुन का प्रतीक माना गया है -


    आवा कागा, बैठा कागा हरियां वृक्ष
    बोल कागा बोल, चौदिसो सगुन


    प्रकृति से मानव का सम्बन्ध इतना आत्मीय है कि पुत्र जन्म पर प्रसूता को भौंरे से अधिक विश्वसनीय कोई संदेशवाहक ही नहीं मिलता। अपनी कुशल-मंगल का संदेश वह भौंरि को संम्बोधित कर इस प्रकार प्रेषित करती है-


    जा धौं भौंरा मांजी का पास हमारी
    जा धौं भौंरा कुशल मंगल बोल आई।
    जा धौं भौंरा बाबा जी का पास हमारा
    कल्याण बोल आई, कुशल मंगल सुणाई।


    पहाड़ का जीवन बड़ा कठिन व श्रमसाध्य है। कुमाउनी में एक कहावत प्रचलित है कि -’पहाड़ोक तैं काठक खुट, लुवक कपाव चैं,’ अर्थात् पहाड़ में निवास करने वालों को काष्ठ के पांव तथा लौह का माथा चहिए। कठिन जीवन जीने वाले पहाड़ के निवासी जीवन की विसंगत, अनपेक्षित परिस्थितियों के बीच प्रकृति से ही सहानुभूति व करूणा,आदि के स्रोत ढूँढ लेते हैं। पूर्वजन्म की असहृय, विषम परिस्थितियों के कारण कफू तथा ’हिलांस’ के जीवन का दुःखद अंत होता है तथा ये अगले जन्म में पक्षी बन जाते है।


    ये पक्षी केवल आत्मीयता ही नहीं बल्कि सहानुभूति की भी सृष्टि करते हैं। अपनी करूणाप्लावित वाणी से आज भी ये लोकजन के हृदय को द्रवित कर देते हैं। वे संदेश वाहक का भी कार्य करते हैं। एक दीर्घावधि से ससुराल में रही अपने मायके न जा पाने वाली स्त्री ’हिलांस’ पक्षी से कोई ऐसा उपाय करने का आग्रह करती है जिससे वह अपने मायके जा सके जहाँ पहाड़ों पर बुराँश फूले हैं और भैंस ब्याही है-


    ’मेरो मैत्यों का डांडा बुरांश फूल्या, हिलांसी जाँण दे मैत’


    पक्षियों का उपालम्भ देना, उनसे अनुनय, विनय, आग्रह करना आदि आत्मीयता के भाव को आत्यन्तिकता के साथ द्योतित करते हैं।


    मायके की याद में दुःखी महिला द्वारा पहाड़ से नीचे हो जाने तथा चीड़ के घने वक्षों से छँट जाने का आग्रह करना ताकि वह अपने मायके के देश को देख पाए- कितना मार्मिक और आत्मीयता पूर्ण है -


    हे उच्ची डांड्यो, तुम नीसी जावा
    घणी कुलायो छाँटी होवा
    मैं कूँ लगीं छ खुद मैतुड़ा की
    मैत को देश देखण देवा


    विदाई के समय वधू स्वयं को ससुराल में अकेला अनुभव करने के विचार से दुखी होती है। ऐसे में पिता के द्वारा यह कहना कि वह उसके भाईयों के साथ भैसों की खरक, गयों का गुठियार, बकरियों का गोठ सभी देंगे, अकेला नहीं भेजेंगे, अद्वितीय है -


    पिछाड़ी घुलू त्वै भैस्यू का खराक
    गौड़ियों की गौठियाख घुलू बाखरियों की तांढी


    उक्त सहज का मार्मिक पंक्तियाँ पशु जगत क प्रति गढ़वाली लोक साहित्य में व्यक्त अपनत्व की प्रतीक है जहां पशु जगत की सामर्थ्य मानव से भी अधिक है क्योंकि ससुराल में जहाँ मायके के सगे सम्बन्धी अकेली वधू का सहारा नहीं बन सकते वहाँ पशु-जगत उसकी सान्त्वना, सहयोग व सहानुभूति देकर उसका अवलम्ब बनता है।


    लोक कथाओं में भी प्रकृति के प्रति लोक जन की आत्मीय अभिव्यक्ति दृष्टि गोचर होती है, जहाँ वह मानव के कार्य व्यापार और भाव जगत की साझीदारी बनी है। कथाओं के पात्र प्रकृति के अभिन्न अंग शेर, चूहा, तोता, कफू, हिलांस आदि हैं। इनमें से कुछ कथा पात्र पक्षी बन कर मानव जीवन की अतृप्त इच्छाओं के स्वरूप की मार्मिक अभिव्यक्ति, तथा कुछ मानव की सहायता व उनका मार्ग प्रशस्त करते हैं। लोक साहित्य में नैतिक मुल्यों की स्थापना के साथ मानव जीवन के लिए मंगल, कल्याण व समृद्धि की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति हुई है।


    गढ़वाली लोक साहित्य में फ्यूँली पुष्प की कथा मार्मिक होने के साथ ही प्रकृति प्रेम का सर्वोत्कृष्ट रूप प्रस्तुत करती है। फ्यूँली सभी जीवन जन्तुओं को अपना भाई कह कर सम्बोधित करती है। जहां पशु-पक्षी मानवीय क्रिया कलापों में संलग्न रहकर मानवीय भावों को कार्य रूप में परिणत करते दिखाई देते हैं तथा फ्यूँली नामक वन कन्या को अश्रुपूर्ण नेत्रों से विदाई देते हैं। रजमहल में फ्यूँली प्रकृति का सानिध्य प्राप्त नहीं कर पाती है। प्रकृति से प्रेम और आत्मीयता की पराकाष्ठा तब देखने को मिलती है जब वह प्रकृति के स्वच्छंद वातावरण से विलग रह कर अवसाद ग्रस्त हो जाती है। इसी अवसाद में उसकी मृत्यु हो जाती है और वह अंतिम इच्छा के रूप में अपने पति से निवेदन करती है कि मृत्युपरान्त उसे उसी पहाड़ में गाड़ दें जहाँ से उसे लाए थे। यह भी आग्रह करती है कि वे उसके भाईयों अर्थात् जीव-जन्तुओं को न मारें। उसके मृत शरीर को जहाँ गाड़ा गया वहाँ पर पीले रंग का जो फूल खिला वहीं फ्यूँली है।


    यह लोक कथा प्रकृति के प्रति आत्मीय सम्बोधन के साथ ही अंहिसा जैसे महत्वपूर्ण मूल्य को भी प्रतिष्ठित करती है। अन्य लोक कथाएँ भी प्रकृति के प्रति आत्मीयता और अभिन्न सम्बन्ध का ही द्योतन करती दिखायी देती है।


    इस प्रकार गढ़वाली लोकसाहित्य में प्रकृति शाश्वत मूल्य के रूप में प्रतिष्ठा पाती है। वर्तमान औद्योगिक, महानगरीय सभ्यता में जहाँ बाजारवाद ने प्रकृति को उपभोग की वस्तु बनाकर रखा दिया है। मनुष्य प्रकृति के प्रति तटस्थ भाव रखने लगा है। स्वहित साधन के लिए प्रकृति का अनुचित दोहन कर रहा है, वहीं गढ़वाली लोक साहित्य में मानव जीवन का स्पन्दन है, प्रकृति आत्मीय सम्बन्धों की पीठिका बनी है। प्रकृति के प्रति देवत्व का ऐसा स्पृहणीय भाव अन्यत्र दुर्लभ है। प्रकृति जन सामान्य के मंगल व कल्याण की कामना से संयुक्त है। जीवन का कोई भी क्षेत्र इन उच्चाश्रयी मूल्यों से विलग नहीं है। जीवन मूल्यों की प्रकृति के माध्यम से ऐसी मौलिक अभिव्यक्ति तथा स्थापना स्वंय में विलक्षण है।


    गढ़वाली लोक साहित्य में प्रेम भी मूल्य रूप में प्रतिष्ठित है। प्रेम केवल प्रिय और प्रिया तक ही सीमित नहीं है बल्कि विविध रूपों में इसका वर्णन मिलता है। गढ़वाली लोकगीतों में छोपती, लामण, बाजूबन्द आदि गीत प्रेम की प्रतिष्ठा करते हैं। छोपती में संयोग तथा वियोग दोनों स्थितियों का चित्रण मिलता है। छूड़े भी कहीं-कहीं प्रेम की अभिव्यक्ति करते है। आजीविका की तलाश में अधिकांश पुरुष गढ़वाल से प्रवास पर दूर चले जाते हैं। अतः गीतों में प्रिया की विरहानुभुति का चित्रण अधिक मिलता है। संयोग के क्षण भी सहज अभिव्यक्त हुए है। प्रिय प्रेम में अपनी प्रिया के गले में घंटी की तरह बँध जाने की भावना से समन्वित है-


    मैं गला घंडूली बांधलो, तू दिल न तोड़ी


    सावन भादो के माह में वियोगिनी के लिए अपने आँसुओं को रोक सकना संभव नहीं हो रहा है। हरे-भरे वनों में बजती बाँसुरी की आवाज और भैसों की घंटी उसके मन को विरहाकुल कर देती है-


    भादों की अंधेरी झकझोर, ना बास ना बास पापी मारे
    न्वैरू की मुरल तू बाज, भैंस्यों की घाटयौन डांडू गाज।।


    लोकगीतों के अतिरिक्त लोकगाथाओं व लोककथाओं में भी प्रेम की प्रतिष्ठा मिलती है। उदाहरणार्थ "पाप और पुण्य" लोक कथा प्रेम की उच्च भाव भूमि को प्रतिष्ठित करती है। किसी गांव की दो स्त्रियों की इस कथा में एक स्त्री का कथन प्रेम को मानव जीवन का श्रेष्ठतम मूल्य सिद्ध कर देता है- "मैंने सिर्फ प्रेम मात्र किया है। उसने सोचा - मैंने हर मनुष्य को प्यार की निगाह से देखा है। कहते हैं कि प्रेम भगवान स्वरूप है। पाप तो मैंने भी नहीं किया। यह सोच कर वह नदी में कुद जाती है। नदी का पानी उतर जाता है और वह नदी पार कर जाती है।" (उत्तराखंण्ड की लोक कथाएं/गोविन्द चातक/पृष्ठ- 47) इन पंक्तियों में अभिव्यक्त प्रेम के अंतर्गत सम्पूर्ण मानवता समाहित हो जाती है। इसके अतिरिक्त मालू राजुला, सरू, फ्यूँली, जीतू बगड़वाल आदि गीति कथाएं प्रेम की ही अभिव्यंजना करती हैं।


    गढ़वाली लोकसाहित्य जीवन के लिए अतिआवश्यक नैतिक मूल्यों की भी स्थापना करता है। 'माँ का कलेजा' लोक कथा माँ के ममत्व, क्षमा, त्याग, उदारता व प्रेम की स्थापना करती है। इस लोक कथा में एक पुत्र भावातिरेक में स्वार्थ के वशीभूत होकर अपनी माँ की हत्या कर देता है। होश आने पर जब वहा माँ के शव को जमीन में गाढ़ने के लिए जाता है तब बरसात का मौसम होने के कारण वर्षा की बूँदें गिरने लगती है जो आकाश से प्रार्थना करती है कि पहले मेरे बेटे को घर वापस लौटने दे तब बरसना। यह सुनकर उसके पुत्र को आत्मग्लानि होती है कि जिस माँ के साथ उसने इतना क्रूरतम व्यवहार किया वह अब भी उसके हित के लिए इतनी चिन्तित है। पुत्र की आत्मग्लानि परोक्षतः मानवीय मूल्यों की स्थापना की ही प्रेरणा देती है।


    इस प्रकार अन्य लोक कथाएँ भी परोपकार, सत्य की विजय, दानशीलता, क्षमा, साहस, दया, करूण, अहिंसा, उदारता, त्याग आदि मूल्यों की स्थापना करती है।


    लोक गीतों में भी नैतिक मूल्यों की उपस्थिति है। लोक गीत में चैत के महीनों में चोरी न करने, चोरी की चीज को न छूने, बैशाख के महीने में तम्बाकू न पीने की सीख दी गई है, ताकि तम्बाकू के धुँए से कलेजा काला न हो जाए और खाँस-खाँस कर नीचे न गिरना पड़े। आषाढ़ के महीने में ईर्ष्यालु न होने तथा पूस में घूस न लेने की उपदेश दिया गया है। फागुन के महीनें में काम करने और बातों में समय न गँवाने को कहा गया है-


    देख चैत चोर छ, चोरी न कैय्या
    चोरी की चीज न छुँया............
    प्यारो मैनो बैशाख को न पे तमाखू के धुँवा
    कालो कस कलेजा बैठलो खाँसी खाँसिक पड़लो भुय्याँ ........
    देख फागुणी धाणी कमौणी
    नी लाणी छुय्याँ.....
    (गढ़वाली लोक गीत विविधा/डॉ दृ गोविन्द चातक/पृष्ठ 121-122)



    भाग- 2 गढ़वाली लोक साहित्य में जीवन मूल्य



    लेखक - श्री एल.पी. ढौंडियाल, नैनिताल
    सर्वाधिकार -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30


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