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    तराई-भाबर का इतिहास - 2

    राज्य के विस्तार होने पर चम्पावत से हट कर बालो कल्याण चन्द्र के समय राज्य के मध्य भाग अल्मोड़ा में (1563) राजधानी बनायी गई। बालो कल्याण के पुत्र रुद्रचन्द्र देव (1565-1598) ने तराई-भाबर की ओर विशेष ध्यान दिया। वह मुगल सम्राट अकबर का समकालीन था। समस्त उत्तरी भारत में मुगल सत्ता का प्रसार हो रहा था। 1569 ई. में लखनऊ के सूबेदार हुसेन खां टुकड़िया ने नेपाल की तराई की ओर बढ़ना शुरू किया। रुद्रचन्द्र के मामा रैका राजा हरिमल ने सेती नदी के पास जुरायल, अजमेरगढ़, बुंदोल धुरा में हुसेन खां का कड़ा विरोध किया। लूटपाट कर हुसेन खां शाहजहांपुर की ओर लौटा। लौटती सेना को नेपाली वीरों ने बहुत हानि पहुंचाई। इसी हुसेन खां ने 1575 में सारे तराई-भाबर को रौंदते हुए पूर्वी दून में बसन्तपुर को लूटा। इसी समय रुद्रदेव चन्द्र अपनी सेना लेकर तराई प्रान्त में आये। तराई का प्रदेश पर्वतीय राज्य की अमूल्य संपदा थी। इसकी सुरक्षा अनिवार्य थी। हुसेन खां टुकड़िया के अत्याचारों से हिन्दू प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठी। दूरदर्शी एवं उदार अकबर ने उसे आगरा बुलवा लिया। किन्तु मुरादाबाद की ओर से मुग़ल अधिकारी तराई की ओर बढ़ रहे थे। रूद्रचन्द्र ने उन्हें मार भगाया। पर आगरा से सेना मुग़ल अधिकारियों की सहायता के लिये मुरादाबाद एवं संभल में आ गयी। कूर्माचल के लिये बड़ी विषम स्थिति थी। भीषण नर-संहार को बचाने के लिये दूरदर्शी रुद्रचन्द्र ने संभल के अधिकारी के समक्ष मल्ल युद्ध का प्रस्ताव रखा। दांव पर तराई प्रान्त रखा गया। स्वयं रुद्रचन्द्र अखाड़े पर उतरे और क्षण भर में अपने प्रतिद्वन्द्वी को पछाड़ दिया। भीषण नर-संहार बचा लिया गया और तराई प्रान्त भी वापस ले लिया। पर रुद्रचन्द्र को इससे संतोष नहीं हुआ। आये दिन मुग़लों के छापे तराई पर पड़ते रहते थे। दूरदर्शी रुद्रचन्द्र ने स्वयं अकबर से भेंट करने का निश्चय किया। इस भेंट का वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनी, फरिव्रता, अबुलफज़ल तथा राजकुमार सलीम ने अपनी पुस्तकों में किया है।


    राजा टोडरमल के पुत्र द्वारा यह भेंट लाहौर में हुई। अकबर रुद्रचन्द्र के तेजस्वी व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुआ। उसने रुद्रचन्द्र से नागौर लेने में सहायता मांगी। रुद्रचन्द्र ने बल-बुद्धि से नागौर जीत लिया। अकबर ने प्रसन्न होकर उसे चौरासी माल की सनद दे दी। पूरनपुर में शारदा नदी से रायपर में पील नदी तक इसकी सीमा थी। सहजगीर, कोटा, मुंडिया, गदरपुर, बोक्सार, बक्सी एवं सरबना इसके सात खण्ड थे। रुद्रचन्द्र ने तराई का शासन प्रबन्ध दृढ़ किया। बोक्सार खण्ड में अपने नाम से प्रसिद्ध रुद्रपुर नगर की नींव डाली। यहां पर एक मजबूत किला बनाया। राजा के एक अधिकारी काशीनाथ अधिकारी ने कोटा खण्ड में वर्तमान काशीपुर की नींव डाली। तराई की व्यवस्था में काशीनाथ अधिकारी तथा उसके वंशजों ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। ये अधिकारी ग्राम रतगल, पट्टी अठ्ठागुली, पर्गना बारामंडल के थे। ये चन्द राजाओं के तराई-भाबर में तहसीलदार थे। पुराने दस्तावेजों एवं ताम्रपत्रों के आधार पर इनका वंश वृक्ष इस प्रकार है-

    kashinath adhikari vansh vriksh

    कोटा-भाबर में शिवनाथपुर गांव के स्वामी बाज बहादुर चन्द्र एवं उद्योत चन्द्र के अनेक ताम्र पत्रों में इनका नाम मिलता है। शिवनाथ के पुत्र परमानन्द अधिकारी कल्याण चन्द्र के समय 1744 में मुनेस (मधेस, मध्यदेश) तराई के तहसीलदार थे। इन्हीं के वंशज रामदत्त अदिकारी कोटा के गवर्नर थे। इन्हीं के समय रुहिला आक्रमण हुआ। इनके पुत्र कृष्णानंद अधिकारी अंग्रेजों के समय 1816 में गंगोली में पटवारी थे। सिंगौली की संधि के बाद इन्होंने अंग्रेजों को तराई पर एक अमूल्य विवरण दिया। इससे 1744 ई. में तराई की आमदनी पर प्रकाश पड़ता है। यह विवरण निम्न तालिका में दर्शाया गया है।


    kashinath adhikari vansh vriksh

    1744 ई. में यह ब्योरा तराई के सात खण्डों में से केवल तीन खण्डों का है। सालाना आमदनी तीन खण्डों की कुल 425251 रुपया थी। इन्हीं अधिकारियों ने प्राचीन दस्तावेजों की सहायता से अंग्रेज अधिकारियों को 1844 ई. में तराई का बंदोबस्त करने में मदद दी।


    रुद्रचन्द्र के बाद उसके पुत्र लक्ष्मीचन्द ने मग़ल सम्राट जहांगीर से भेंट की। इस भेंट का वर्णन जहांगीर ने नुजुक जहांगीरी में किया है। त्रिमल चन्द्र के समय भी तराई का अच्छा प्रबन्ध रहा। पर उसके बाद ठाकुर द्वारा की ओर से कठेड़ी राजाओं ने तराई की ओर बढ़ना प्रारम्भ किया। त्रिमल चन्द्र के पुत्र बाजबहादुर चन्द्र (1638-1678) के समक्ष यह विषम स्थिति आयी। इन कठेड़ियों की सहायता मुरादाबाद के मुग़ल अधिकारी करते थे। बाजबहादुर चन्द्र ने मुग़ल सम्राट शाहजहां से भेंट की। काबुल कन्दहार के अभियान में मुग़ल सम्राट की सहायता की। शाहजहां ने प्रसन्न होकर मुरादाबाद के संस्थापक नवाब रुस्तम को आदेश दिया कि कठेड़ियों के विरुद्ध बाजबहादुर को सहायता दी जाए। कठेड़ियों का बढ़ना रोका गया। फिर से तराई में सुव्यवस्था स्थापित हुई। इसका रोचक वर्णन कल्याण चन्द्रोदय काव्य के दूसरे सर्ग में मिलता है। तराई की व्यवस्था दृढ़ करने में बाजबहादुर को बाड़ा खोड़ा, भीमताल के पं. विश्वेश्वर पाण्डे जी ने सहायता दी। द्वारका दास कायस्थ, रमा पंडित, श्रीनाथ, जगन्नाथ एवं रामभद्र उनके प्रमुख सहायक थे। मुंडिया में एक और नगर की नींव पड़ी। इसका नाम बाजबहादुर के नाम पर बाजपुर रखा गया।


    पं. विश्वेश्वर पांडे जी ने अपनी योजना को सफल बनाने के लिए रुद्रपुर को अपना केन्द्र बनाया। जंगल काट कर कृषि के लिए भूमि तैयार की गई। धान, ईख, गेहूं, तिल एवं सरसों की खेती करवाई। जहां पानी का अभाव था वहां नदी, नहर एवं गूलों द्वारा सिंचाई करवाई गयी। पर्वतीय भागों से बुलवा कर कृषकों को भूमि दी गयी। सड़कों पर सुरक्षा के लिए स्थान-स्थान पर दुर्ग बनवाये। उनमें सैनिक रखे गये। पंजाब, जम्मू से सैनिकों की भर्ती की गयी। सैनिकों के वेतन का भुगतान करने के लिए प्रजा से उपज का छठा भाग लिया गया। हैड़ियों को चौरासी माल की सीमा पर सुरक्षा के लिये रखा गया। शान्ति, सुरक्षा स्थापित होने पर पैदावर बढ़ी और चन्द राज्य की आर्थिक दशा सुधरी। उन दिनों चन्द राज्य के अधिकारी रुद्रपुर, बाजपुर एवं काशीपुर रहते थे। गर्मियों के दिनों में भीमताल के पास बटोश्वर या कोटा-भाबर में देवीपुर या शिवनाथपुर आ जाते थे।


    कल्याण चन्द्र (1730-47) के समय तराई-भाबर में रुहीला सर्दार अदनी मुहम्मद खाँ के आक्रमण हुए। इस समय रुद्रपुर में गवर्नर जिझाड़ के शिव देश जोशी थे। इस वीर स्वामिभक्त अधिकारी ने चार युद्धों में रुद्रपुर, विजयपुर (भीमताल), गगास (कैड़ेरौ) तथा द्वाराहाट में रुहीला सेना का सामना किया पर हारा। पर इस वीर ने हार नहीं मानी। अन्तिम निर्णायक युद्ध भीमताल के पास बाड़ाखोड़ा में 1745 में हुआ। इस युद्ध में रुहेले पूर्णतः पराजित हुए। तराई-भाबर से रुहीला सेना हटायी गयी। लगभग 17 साल तक शिवदेव जोशी तथा उनके बांधव हरीराम जोशी ने तराई का प्रबन्ध सुदृढ़ किया। रुहीला सर्दार हाफिज रहमत खाँ, नजीबुद्दौल्ला से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखे गये। मुग़ल सम्राट से सौहार्द भाव रखा। पर अवध के नवाब सफदर जंग की लोलुप दृष्टि सरबना पर थी। शिवदेव जोशी ने अवध की सेना का विरोध किया। इस युद्ध में घायल होने पर शिवदेव बंदी बनाये गये। दो साल तक फैज़ाबाद में कैद रहे। अन्त में मुग़ल सम्राट के हस्तक्षेप करने पर मुक्त हुए। इन्होंने फिर सर्बना पर अधिकार कर लिया। 17 साल तक इस वीर चतुर राजनीतिज्ञ ने इतनी दक्षता से तराई का प्रबन्ध किया कि सभी इतिहासकार मुक्त कंठ से उसकी प्रशंसा करते हैं। पर 1764 में इस योग्य अधिकारी की काशीपुर में हत्या हुई। इसी तिथि से कूर्माचल में चन्द सत्ता का ह्रास प्रारम्भ हुआ। तराई की व्यवस्था पर इसका हानिकारक प्रभाव पड़ा।


    शिवदेव की मृत्यु के बाद मनोरथ जोशी एवं जयकृष्ण जोशी ने तराई की व्यवस्था की। पर अल्मोड़ा में पद व शक्ति प्राप्त करने के लिए षडयन्त्रों एवं हत्याओं का ऐसा सिलसिला बंधा कि तराई से चन्द सत्ता उठ गयी। शिवदेव के सहायक मुंडिया (बाजपुर) के निवासी शिरोमणिदास के पुत्र नन्दराम ने सुअवसर पाकर तराई पर अपना अधिकार कर लिया। अपनी स्थिति सुरक्षित करने के लिये इस व्यक्ति ने तराई की व्यवस्था अवध के नवाब शुजाउद्दौल्ला को सौंप दी। स्वयं नवाब का इजरारदार बन कर तराई का प्रबन्ध करने लगा। 1802 ई. में लार्ड वेलेजली के समय अवध के नवाब ने सहायक संधि के अनुसार गोरखपुर एवं रुहेलखण्ड अंग्रेजों को सौंप दिये। रुहेलखण्ड के साथ ही यह तराई का प्रान्त 1802 में अंग्रेजों के हाथ आ गया। उस समय नन्दराम के भाई हरगोबिंद के पुत्र शिवलाल तराई के आमील थे।


    कीर्ति चन्द, रुद्र चन्द, बाजबहादुर चन्द के प्रयत्नों से अर्जित, विश्वेश्वर पांडे, शिवदेव जोशी, हरिराम जोशी जैसे कुशल प्रबन्धकों से परिपोषित तराई, कुचक्र षडयंत्रों के फलस्वरूप अंग्रेजों के हाथ आयी।


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